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सभ्यता का सफ़र- 1

धरती पर मानव प्रजाति होमो सेपियन्स का जन्म लगभग 3 लाख वर्ष पूर्व हुआ था। हम से पूर्व धरती पर हम से मिलती जुलती अन्य प्रजातियां जिन्हे होमिनिड कहा जाता है लाखों वर्षों से मौजूद थीं। मानव प्रजाति के इतिहास के दो भाग हैं - एक 3 लाख वर्ष से ले कर पिछले 15 से 20 हज़ार वर्ष तक और दूसरा भाग है पिछले 15 से 20 हज़ार वर्ष से आज तक। अपने उदभव के आरंभिक तीन लाख वर्षों में होमो सेपियन्स में विकास बहुत धीरे धीरे हुआ लेकिन पिछले 15 - 20 हज़ार वर्षों के इतिहास में होमो सेपियन्स बहुत तेज़ी से सभ्य होते गए और यह सभ्यता और प्रगति तेज़ से तेज़ होती गयी और आज आधुनिक युग में हम पहुँच गए। होमो सेपियन्स की आरम्भ की पीढ़ियों को हम होमो सेपियन्स प्री सेपियन्स कह सकते हैं और पिछले 20 हज़ार वर्षों से चल रही पीढ़ियों को होमो सेपियन्स सेपियन्स कह सकते हैं अर्थात प्रजाति तो एक है किन्तु अवस्थाएं दो हैं। मान लीजिये 3 लाख वर्ष पूर्व विकसित मानव प्रजाति को सीधे खड़े हो कर चलना आ गया , हाथों का इस्तेमाल कुशलतापूर्वक करना आ गया डंडी से फल तोड़ना आ गया आग का इस्तेमाल आ गया मछली पकड़ना आ गया पत्थर से औज़ार बनाना आ गया और आपस में इशारे और कुछ आवाज़ निकालना आ गया। यह सब योग्यताएं और उपलब्धियां होमिनिड की अन्य समाप्त हो चुकी प्रजातियों में भी रही होंगी। होमो सेपियन्स प्री सेपियन्स क्या क्या कर सकते होंगे ? इनमें दो तरह के लोग रहे होंगे - एक वे जो झुण्ड बना कर झुण्ड में रहते होंगे जैसे कि हम सड़क पर रैलियों में तीर्थ स्थानों सभा स्थलों पर रहते हैं हरेक झुण्ड में पर अकेला - कोई क़बीला या परिवार नहीं होता - लेकिन ज़रूरत पड़ने पर आपस में सहयोग करते थे। दूसरे वे लोग जो झुण्ड से निकल कर अकेले अकेले रहते होंगे। ये लोग कच्चा मांस , मछली , अंडे और फल खाते रहे होंगे। जंगल में अपने आप लगी आग में झुलस जाने वाली चिड़ियों और जानवरों का मांस अधिक स्वादिष्ट और सुपाच्य लगा होगा और आग में झुलस गयी साग सब्ज़ी फल बीज भी खाने में ठीक लगे होंगे - इस तरह खाने योग्य चीज़ों की वृद्धि हुयी होगी। झुण्ड को भोजन के लिए जानवरों चिड़ियों को पालना नहीं आया होगा - उन्हें जो भी खाना था जंगल नदी तालाब से लेना था लेकिन बचा कर रखना आ गया होगा और साथ में बच्चों बूढ़ों गर्भवती प्रसूति के भोजन की व्यवस्था भी हो जाती होगी। कुल्ली करना खाने के पहले खाने के बाद हाथ मुंह धोना नहीं आता होगा। पेशाब और टट्टी के लिए झुक जाते होंगे या बैठ जाते होंगे लेकिन यह सब करने के लिए थोड़ा अलग जाना या एकांत आड़ ओट नहीं तलाशते होंगे। सोते में सुरक्षित रहने के लिए झाड़ी , पेड़ या गुफ़ा तलाशते होंगे और एक से एक लिपट कर सट कर सोते होंगे कि अगर एक पर हमला हो तो सब जाग जायें। संभोग के लिए एकांत ढूंढते होंगे। कभी कभी पूरा झुण्ड नहाने के लिए नदी तालाब पर जाता होगा - पानी पीने एक दो लोग जाते होंगे - पानी का भंडारण भी नहीं आता होगा। पास में ही पानी का स्रोत रहता होगा। प्रसव के समय दूसरी मादा सहायता के लिए आ जाती होंगी। मेरी यह कल्पना है कि इस प्रजाति में से 20 हज़ार पूर्व जेनेटिक सेल्फ एक्सटिंक्शन हुआ इस प्रजाति की सभी मादा अंड विहीन हो गयी थीं उनके कोई संतान उत्पन्न नहीं हो सकती थीं और केवल कुछ मादा के म्युटेशन के बाद अनोखे बच्चे पैदा हुए - शायद मस्तिष्क विकास के कारण इनका माथा बड़ा था और चेहरे में सुन्दर अनुपात था। आंखें कौतूहल दर्शाती थीं। ऐसे सुन्दर बच्चे जिन पर उनकी मातायें मुग्ध हो गयीं और उन्हें डर हुआ कहीं उनके नर इन बच्चों को मार ना डालें तो इन माताओं ने इन बच्चों को एक गुफा में ले जा कर छुपा दिया। इस गुफा का रास्ता ऐसा था जिससे कोई दूसरा अनजान पहुँच न सके। यह मातायें बारी बारी छुप कर अपने अनोखे बच्चों की की देखभाल के लिए गुफा में आती थीं - गुफा के पास पानी का झरना था और फलों के पेड़ थे। आज भी हर माँ को लगता है कि उसका बच्चा सबसे अनोखा है। इन बच्चों के अंदर मानव चेतना थी - उन्हें ज्ञान था कि वे हैं , उनके जैसे अन्य हैं , उनसे अलग तरह तरह के पशु पक्षी पेड़ पौधे हैं और वे सिर्फ घटनाओं को समझ ही नहीं पाते थे उनको व्यक्त करने की तीव्र इच्छा होती थी - वर्षा हो रही है यह बात सिर्फ उन्हें मालूम नहीं होता था बल्कि वे आपस में इसको व्यक्त भी करते थे। उन्हें बीती घटनाओं की स्मृति भी रहती थी और भविष्य का एहसास भी। ठंडी हवा और बादल देख कर उन्हें अंदाजा हो जाता था कि वर्षा होने वाली है। हर माँ हर बच्चे की माँ थी और हर बच्चा हर माँ का बच्चा था। इन बच्चों के मन में गंदगी के प्रति घिन की भावना भी थी और नंगेपन के प्रति और कोई गलती हो जाने पर शर्म की भावना भी थी। जो बच्चा टट्टी पेशाब से गंदा हो जाता तो बहुत मानसिक वेदना में रहता रोता रहता अपने हाथों से मुंह छुपा लेता। माताएं बच्चों को साफ़ करतीं दूध पिलातीं। इन बच्चों को नंगेपन का भी बहुत एहसास रहता , टांगों से छुपाये रहते और जब हाथों पर कंट्रोल हुआ तो हाथ से ढके रहते। माँओं को यह बात समझ में आ गयी तो बच्चों के लिए पत्तियों और पेड़ की छालों से उन्हें लपेटने लगीं और फिर माएं बच्चों की गुफा में आने से पहले अपने को साफ कर लेती और अपने को पत्तों छाल से ढांक लेतीं। इस तरह धीरे धीरे पूरी प्रजाति ने अपने को साफ रखना ढकना शुरू किया। फिर जब बच्चे कुछ बड़े हुए पानी और फल खिलातीं। बच्चों को खूब प्यार कर के दुःख भरे दिल से विदा होतीं। जब किसी दुर्घटना वश या अन्य कारण से किसी माँ की मृत्यु हुयी या गंभीर स्थिति में हुयी तो उसे उठा कर अन्य माएँ बच्चों की गुफा में ले आतीं बच्चे उससे लिपटे रहते छोड़ते नहीं तब पास की एक गुफा में मृत शरीर को रख दिया जाता और पत्थर से ढक दिया जाता लेकिन कुछ दरार रहती जिससे बच्चे जा जा कर देखते। इस तरह पूरी प्रजाति को अपने मृतकों को सम्मान देना आया और ऐसी गुफाएं इस काम के लिए निर्धारित की गयीं। जब लड़के लड़कियां बड़े होने लगे तो धीरे धीरे गुफा के एक तरफ लड़कियां रहने लगीं और दूसरी तरफ लड़के रहने लगे। किसी माँ के आने पर ख़ुशी और उसका स्वागत और जाते वक़्त भारी मन से अलविदा कहना यह लड़कियों ने शुरू किया और सभी बच्चों ने और माँओं ने भी यह रीति अपना ली। लेकिन माँओं से यह रोज़ की विदाई बहुत दुखदायी होती थी - बच्चों से ज़्यादा माँओं के लिए। बच्चों में जो लड़कियां थीं उन्होंने इस दुःख भरे प्यार को अपनी माँओं के पिछड़ेपन को खूब महसूस किया - आज भी दुनिया में पैदा होने वाला इंसान अपने दिल में यह खालीपन ले कर पैदा होता है और जीवन भर यह खालीपन लिए रहता है। यह खालीपन सिर्फ प्यार से भरता है लेकिन इंसान दौलत हवस ताक़त ग़ुरूर या नफ़रत से भरने की ज़िन्दगी भर नाकाम कोशिशें करता रहता है। बड़े होते बच्चे हँसना मुस्कुराना ताली बजाना चुटकी बजाना सीटी बजाना कान में फुसफुसाना गुनगुनाना गाना गुदगुदी करना कलाबाज़ी करना थिरकना मटकना आँखें चलाना आँखें झपकाना सीखते गए और माओं का दिल जीतते गए। गुफा में जानवर प्रवेश न करैं इसलिए गुफा के बाहर निरंतर आग जलती रखी जाती होगी और रात में उसी से अंदर कुछ रौशनी भी रहती होगी - आग की लपटें और धुंआ कभी कभी बच्चों को अपनी माँओं की आकृति जैसा भी लगता होगा। माऍं बच्चों को मांस मछली भी आग में कुछ भून कर देती होंगी। मिलने वक़्त और बिदा होते वक़्त कुछ इशारे कुछ आवाज़ें माँओं की तरफ से कुछ बच्चों की तरफ से होते होंगे। माँओं और बच्चों के अलग अलग नाम भी पड़ गए होंगे - दो अक्षर तीन अक्षर की आवाज़ वाले। माँओं को तो लिंग भेद होगा -कौन बच्चा नर है कौन बच्चा मादा और जल्द ही लड़कियों ने भी जान लिया होगा।  

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