अगर कोई सच्चा मुसलमान है जिसे ख़ुदा के वजूद पर यक़ीन है तो सबसे पहले वह यह तो मानेगा कि सारे इंसान आपस में बराबर हैं और सबके इस दुनिया में जीने रहने के हक़ हैं। फिर वह यह भी मानेगा कि सारे जानवर , चिड़ियाँ मछलियां कीड़े मकोड़े सब ख़ुदा की मख्लूक़ हैं और सबके इस दुनिया में जीने रहने के हक़ हैं। यह पूरी क़ुदरत पूरी कायनात ख़ुदा की है तो उसकी फ़िक्र होनी चाहिए की प्रकृति में प्रदूषण न हो। उसकी फ़िक्र होनी चाहिए नुक्लेअर , केमिकल और बायो अस्त्र न हों। उसकी फ़िक्र होनी चाहिए कि जो पेड़ काटे जा रहे हैं जो जानवर खाल दांत के लिए मारे जा रहे हैं जो लगातार प्रकृति जीवों और वनों की लूट चल रही है वह न हो। जो दुनिया में गरीबी है गुलामी है जो अन्याय है जो बरसों से बच्चे स्त्री पुरुष जेलों सुधार गृहों पागल खानों में बंद हैं जो अपराध तंत्र में फंसे हैं उनकी उसे फ़िक्र होनी चाहिए। अब अगर क़ुरान और हदीस में कोई बात सत्य और हक़ के खिलाफ है तो उसे आज की दुनिया में नहीं मानेगा क्यूंकि 1400 वर्ष पूर्व की दुनिया दूसरी थी और आज की दुनिया उससे अलग है। अगर लिखा है औरत कहना न माने तो उसे मारो - खून न बहे हड्डी न टूटे तो इस ब...