पुरुष के लिए स्त्री का साथ बहुत ज़रूरी है और कई पुरुष पत्नी की मृत्यु के बाद ज़िंदा नहीं रह पाते लेकिन अगर वे तुरंत दूसरी जीवन साथी खोज पाते तो लम्बी उम्र ज़िंदा रहते। सती प्रथा तो पहले होती थी पर आज बेटे बहू बेटी दामाद माँ की मृत्यु के बाद यही चाहते हैं कि उनका बाप विधवा जीवन जिए। ऐसे ही वे नासमझ स्त्री पुरुष हैं जिनकी उम्र गुज़रती जा रही है और बिन ब्याहे बैठे हैं और वह भी जो तलाक़ या जीवन साथी की मृत्यु के बाद जल्दी से दूसरा जीवन साथी नहीं ढूंढ लेते हैं। पर एक बहुत बड़ी तादाद उन मर्दों और औरतों की भी है जो नापसंद रिश्तों का बोझ उठाये हुए हैं और जिनकी तमन्ना है काश उनकी ज़िन्दगी में बहार फिर से आये - शरीयत इजाज़त देती है पर समाज और हुकूमत सिपर लिए खड़े हैं। बच्चों की खातिर नापसंद रिश्ते को निभाना तारीफ़ की बात है पर जब बच्चे बड़े हो जाएँ अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ और अपना घर बसा लें तो अगर शरीके हयात ज़ुल्म या खयानत करता हो तो अलग हो जाने में ही भलाई है। नेकी का तक़ाज़ा यह है कि ऐसे मर्द अपनी बीवी के लिए और ऐसी औरत अपने शौहर के लिए पहले शरीके हयात का आगे बढ़ कर इंतज़ाम कर दे। बचपन से जवानी और अब अ...